नई दिल्ली — Supreme Court of India ने सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission – PC) देने में हुई देरी और अस्वीकृति को “प्रणालीगत भेदभाव” करार दिया है। अदालत ने कहा कि करियर मूल्यांकन में पूर्वाग्रहों के कारण कई महिला अधिकारियों को अवसरों से वंचित किया गया।
मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें Justice Ujjal Bhuyan और Justice N Kotiswar Singh शामिल थे, ने यह टिप्पणी करते हुए कई महिला अधिकारियों को राहत दी।
करियर मूल्यांकन में पक्षपात
अदालत ने पाया कि महिला अधिकारियों की योग्यता का आकलन ऐसे अनुमानों पर आधारित था, जो उनके करियर विकास के खिलाफ थे। कोर्ट ने कहा कि उन्हें “दीर्घकालिक करियर के लिए अयोग्य” मानना वास्तविक योग्यता का नहीं बल्कि भेदभावपूर्ण सोच का परिणाम था।
अदालत ने Article 142 of the Constitution of India का उपयोग करते हुए “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप किया।
सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग-अलग निर्देश
थल सेना (Army)
- स्थायी कमीशन केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रहेगा; महिलाओं को समान अवसर मिलेगा।
- जिन महिला अधिकारियों को पहले PC दिया जा चुका है, उसे बरकरार रखा जाएगा।
- जो अधिकारी सेवा से बाहर हो चुकी हैं, उन्हें एकमुश्त राहत के रूप में 20 वर्ष की सेवा मानकर पेंशन दी जाएगी (बिना वेतन बकाया के)।
नौसेना (Navy)
- चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को कोर्ट ने गंभीर माना।
- कुछ श्रेणियों की महिला अधिकारियों को पदोन्नति देने के निर्देश दिए गए।
- 2025 में सेवा छोड़ चुकी योग्य अधिकारियों को 20 वर्ष की सेवा मानकर पेंशन देने का आदेश।
वायुसेना (Air Force)
- कोर्ट ने कहा कि 2019 में लागू मानदंडों को पूरा करने का उचित अवसर महिलाओं को नहीं दिया गया।
- पुनर्नियुक्ति (reinstatement) का आदेश नहीं दिया गया, लेकिन पेंशन और अन्य लाभ देने का निर्देश दिया गया।
- 2019–2021 के बीच चयन प्रक्रिया में शामिल सभी अधिकारियों को 20 वर्ष की सेवा मानकर लाभ दिए जाएंगे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत नियुक्त महिला अधिकारियों की याचिकाओं से जुड़ा था, जो स्थायी कमीशन की मांग कर रही थीं। SSC अधिकारी आमतौर पर 10–14 वर्ष की सीमित अवधि के लिए सेवा करते हैं और PC न मिलने पर उन्हें सेवा छोड़नी पड़ती है।
कई अधिकारियों ने पहले Armed Forces Tribunal का रुख किया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को पहले अवसर ही नहीं दिया गया और बाद में उसी आधार पर उन्हें अयोग्य ठहराया गया। यह न केवल अनुचित बल्कि असंवैधानिक भी है।
भविष्य के लिए निर्देश
अदालत ने निर्देश दिया कि भविष्य में सभी चयन बोर्ड से पहले विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए जाएं, जिसमें रिक्तियों, मूल्यांकन मानदंड और अंक प्रणाली की पूरी जानकारी हो।
व्यापक असर
यह फैसला सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य की महिला अधिकारियों के लिए भी समान अवसर सुनिश्चित करने का रास्ता साफ हुआ है।